Friday, 15 February 2019

वक़्त


This is my second post in which I will be posting my 1st write up. Today I'll post my first poem that is "vakt".This is poem about our present situation.
          वक्त
प्राचीन काल चला गया 
आधुनिक काल छा गया!
कलीयुग के प्रताडन में ...
वक्त का पता ही न चला!!

सुबह छुटी अंधेरा हो आया
तारों के खेल में चाँद आया!
हार-जित के दुख-सुख में ...
वक्त का पता ही न चला!!

हसता रोता बचपन चला गया
यौवन आया बुढापा दिखलाया!
जवानी के महकते दौर में ...
वक्त का पता ही न चला!!

वक्त बितता चला गया
आदमी बदलता चला गया!
स्वार्थ के मोहजाल में ...
वक्त का पता ही न चला!!

जिंदगी में लोग आते गये
रिस्तों के मायने बदलते गये!
अपनों के स्नेह बंधनों में ...
वक्त का पता ही न चला!!

कौन पिछे छुट गया
कौन आगे चला गया!
अता-पता लगाने में ...
वक्त का पता ही न चला!!

बाह्य सौंदर्य उजागर हो गया
आन्तरिय सौंदर्य फीका पड गया!
खुद को समझाने में ...
वक्त का पता ही न चला!!

इंसानियत पर अहंकार छा गया
तन-मन को नफरत ने आपनाया!
औरों के अवगुण दिखाने में ...
वक्त का पता ही न चला!!

हम सिर्फ सपनों को सजाते रहे
वे सपनों को साकार बानाते रहे!
असफलता के छायें में ...
वक्त का पता ही न चला!!

कवयित्रीः-   कुमारी सुविद्या नाईक 

35 comments:

  1. Amazing dear♥💯such a creative poe❤

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  2. Woooowww...
    Proud of u Suvidhya 👍...Amma

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  3. I also feel that living in present is most important now a days rather than thinking about past...

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  4. Nice one dear👌👌👌👌👌👌

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