Friday, 17 July 2020

मन ये उदास है .... मन ये क्यों उदास है, दिल ये क्यों रुठा है, कैसी ये बैचेनी है, मुझको ये सताती है, पल-पल तेरी याद आती है, यादो की ये उमंग रुलाती है, मन उदास है, हा बस उदास है। © सुविध्या

मॉ


हर स्थल पर भगवान्
का वास,
मुमकिन न था ,
इसलिए मॉ का अवतार  उन्होंने है बनाया ।

ममता की है वो मुरत ,
मासूम सी है उसकी सूरत ,
प्रेम, दया और करुणा ,
इस में सजी हुई है मेरी मॉ।

अगर चोट लगे मुझे ,
दर्द उसके मुख पर झलके ,
रक्त मेरे घॉव से निकले ,
पर आंसू उसकी आंखो से बहे।

नोकझोंक होती रहे हमारी ,
पल भर में रूठना ,
पल भर में गुस्सा होना ,
और पल भर में
एक -दुसरे को मनाना ।

हॉ, पता है मुझे मॉ ,
मैं करती हू बहुत शैतानीयॉ ,
परंतु  शैतानी न करु ,
तो गुस्से में छिपा मेरी मॉ का प्यार कैसे जानू।

मेरा सहारा मेरी 'मॉ',
मॉ का सहारा हू 'मैं',
एक-दूसरे में है हम बसे,
यह देख प्रभु भी हर्षित हो उठे।
- सुविध्या

Friday, 15 March 2019

याद

                   याद
हर पल हर दिन 
तेरी याद आती है ।

गुजर गए कई  महीने, 
अब तक हम नही मिले,
हर पल जो तेरे साथ बिताए थे,
बार-बार वह याद आते है।।

पूछती रहती हू रोज
भगवान से,
मिलेंगे कब हम,
एक दूसरे से।

क्या करू इस दिल का
जो बार-बार तेरी याद 
दिलाता है,
बार-बार तुझसे मिलने का
जिक्र करता है।

कभी-कभी लगता है 
सब किस्मत पर छोड दू,
लेकिन यह याद है 
जो मुझे बेबस कर देती है।

हर पल हर दिन 
तेरी याद आती है।

Monday, 25 February 2019

सपनों की उड़ान

                   सपनो की उड़ान
"बिटिया, पानी भरकर हो गया क्या?" माँ ने शोभा को जोर से पूछा। शोभा ने माॅ की आवाज सुनी और जल्दी-जल्दी पानी का घडा भरकर घर पहुँची।शोभा अपने माता-पिता के साथ छोटी सी बस्ती में रहती थी। वह स्वभाव से बहुत अच्छी,मददगार, उसके साथ-साथ बड़ी होशियार लड़की थी। वे बहुत गरीब थे। उसके पिताजी मजदूरी का काम करते थे और माँ घर का चुला-चौका संभालती थी। शोभा हर बार कक्षा में अव्वल आती थी। उसका सपना था कि वह बड़ी होकर अफसर बने और उसके पास यह सपना साकार करने की काबिलियत भी थी।लेकिन उसके मां-पिता को उसका ज्यादा पढ़ना-लिखना पसंद नही था।पिताजी उसके शादी के पीछे लगे थे।उनको सिर्फ यही चाहीये था कि वह पढ़ाई के चक्कर में न पडकर अपना घर बसाये। इसके साथ उनकी थोड़ी जिम्मेदारी भी कम हो जाती।
पिताजी ने उसकी पढ़ाई दसवी के बाद रोक दी थी।इसकेइसके वजह से शोभा बहुत रोई,लेकिन उसने अपना इरादा पक्का कर दिया था कि वह अफसर जरुर बनेगी।जब पिताजी ने उससे शादी की बात छेडी तो उसने विनती भरे स्वर में कहा, "पिताजी, मुझे अभी शादी नही करनी है।मैं आपके पैर पडती हू,कृपया कर मुझे थोड़ा वक्त दिजिये। पिताजी शोभा से बहुत प्यार करते थे।वह उसकी बात टाल न सके।वह धीमे स्वर में बोले, "ठीक है बेटा, जैसी तुम्हारी मर्जी।मै तुम्हारी इसलिए शादी कराना चाहता था ताकि तुमे अपने ससुराल मे दो वक्त की रोटी मिल सके।मेरी कमाई तुम लोगो को दो वक्त का खाना नही दे सकती।इस बात काम मुझे रोज खेद होता है।" यह सुनकर शोभा को बहुत बुरा लगता है।वह तय करती है कि काम के साथ-साथ वह चोरी छिपे अपनी पढ़ाई भी पुरी करेगी।उसने काम के बारे मे पितामह से इजाजत मांग ली थी।वह एक दुकान पर काम करने जाती थी।वहा वह किताब का हिसाब रखती थी।उसे वहा दस पैसे की तनख्वाह मिल जाती थी।सुबह को वह पढ़ाई करने के लिए चली जाती और शाम को दुकान पर जाती थी।उसके पढ़ाई के बारे मे घर पर किसी को भी पता नही था।इस तरह वह अपनी पढाई भी पुरी कर रही थी और घर मे मां-पिताजी का हाथ भी बटा रही थी।ऐसे ही पांच साल बीत गए।उसने अपनी सारी पढाई खत्म कर अफसर बनने की परीक्षा दी थी।आज उसका निकाल आने वाला था।आज वह सबसे जल्दी उठकर,मां-पिताजी का आशीर्वाद लेकर दौड़कर अखबार लाने चली गई।मां-पिताजी को क्या हो रहा था वह समज मे नही आ रहा था।तभी पडोस के लोग उनके घर आ जाते है।मां उन्हे देखकर घबरा जाती है और पूछती है,"क्या हुआ?आप सब लोग यहा?"
अरे शोभा की मां,बधाई हो।जल्दी अपना मुंह मीठा करो।हमारी शोभा बिटिया अफसर बन गई है।"यह सुनकर मां-पिताजी दंग रह गए।"क्या?"दोनो के मुंह से एकही शब्द निकला।लेकिन शोभा ने यह सब किया कब?पढ़ाई पुरी कब की?वह तो काम पर जाती थी।यह सारे सवाल उनके मन मे चल रहे थे।
उसी वक्त शोभा वहा आ पहुंची। उसने सीधे जाकर मां-पिताजी से कहा,"मां-पिताजी मुझे माफ किजिये।आपको बिना बताए यह फैसला लिया।मुझे आपकी यह हालत देखी नही जा रही थी।आप दोनो ने मेरे लिए बहुत संघर्ष किये है।इसलिए मेरा भी फर्ज बनता है कि अब मै यह जिम्मेदारी मुझपर लू।"यह सुनकर मां-पिताजी के आखो मे पानी आ गये और उन्होंने उसे गले लगा लिया।शोभा ने अपने हालात से समझौता नही किया बल्कि अपने हालातो का दटकर सामना किया और अपने सपनों को साकार कर अफसर बिटिया बन गई।

This story is about the girl who completed her dream in spite of being poor and also made her parents proud. This is the best example for those who always think that 'the situation will never changed it will remain the same.'

Friday, 15 February 2019

वक़्त


This is my second post in which I will be posting my 1st write up. Today I'll post my first poem that is "vakt".This is poem about our present situation.
          वक्त
प्राचीन काल चला गया 
आधुनिक काल छा गया!
कलीयुग के प्रताडन में ...
वक्त का पता ही न चला!!

सुबह छुटी अंधेरा हो आया
तारों के खेल में चाँद आया!
हार-जित के दुख-सुख में ...
वक्त का पता ही न चला!!

हसता रोता बचपन चला गया
यौवन आया बुढापा दिखलाया!
जवानी के महकते दौर में ...
वक्त का पता ही न चला!!

वक्त बितता चला गया
आदमी बदलता चला गया!
स्वार्थ के मोहजाल में ...
वक्त का पता ही न चला!!

जिंदगी में लोग आते गये
रिस्तों के मायने बदलते गये!
अपनों के स्नेह बंधनों में ...
वक्त का पता ही न चला!!

कौन पिछे छुट गया
कौन आगे चला गया!
अता-पता लगाने में ...
वक्त का पता ही न चला!!

बाह्य सौंदर्य उजागर हो गया
आन्तरिय सौंदर्य फीका पड गया!
खुद को समझाने में ...
वक्त का पता ही न चला!!

इंसानियत पर अहंकार छा गया
तन-मन को नफरत ने आपनाया!
औरों के अवगुण दिखाने में ...
वक्त का पता ही न चला!!

हम सिर्फ सपनों को सजाते रहे
वे सपनों को साकार बानाते रहे!
असफलता के छायें में ...
वक्त का पता ही न चला!!

कवयित्रीः-   कुमारी सुविद्या नाईक 

Sunday, 10 February 2019

Introduction

यह ब्लोग  मेरे स्वरचित कविताओ, कहानी, सुविचार, लेख पर आधारित है। मैं हर हफ्ते एक नई कविता या कहानी या सुविचार प्रसारित करूंगी। मेरा आप सभी से निवेदन है कि आप भी मेरी कला को प्रोत्साहन दीजियेगा।